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बरखा
March 2024
"तृष्णा बुझाती उग्र धरा की, कंठ भीगाती जल शीतल सी, किसी नित्य सूरज धुँधलाती, तुम उस सर्द श्यामल संध्या सी। व्यथित हुए एकाकी मन को, जननी के मध्धम स्पर्श सी, ...
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उत्सुक · उन्मुक्त · विहारी
हर रचना एक खुली खिड़की है, जहाँ कोई पल दस्तक देता है और कहता है — “मुझे लिखो, वरना मैं तुम्हारे भीतर अधूरा रह जाऊँगा।”